विश्व टीबी रोग 1882 से समझा, जागरूकता से लक्ष्य प्राप्ति संभव है—-
केंद्र सरकार ने 7 दिसंबर 2024 से 100 दिवस में टीबी उन्मूलन अभियान की शुरुआत हरियाणा के पंचकूला से की गई, इसमें टीबी मरीजों की पहचान बढ़ाने, इलाज में तेजी को कम करने, उपचार के परिणाम में सुधार पर ध्यान देने का ऐलान किया गया था l देश के 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 347 जिलों में यह टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्रम संबंधी गतिविधियों को मजबूत करना ,टीबी के परिणामों को असमानता को कम करना आदि लक्ष्य तय किए गए थे, इसी की विस्तृत समीक्षा की जा रही हैl
भारत देश मे अब स्वास्थ्य सुविधाएं आजादी के बाद से बेहतर होती जा रही है। आजादी के समय स्वास्थ्य समस्याएं सबसे बड़ी चुनौती थी, संक्रामक और जटिल बीमारियों की आवक ज्यादा थी ,तो वही उपचार के पर्याप्त संसाधन भी नहीं थे। क्षय या टीबी या तपेदिक की बीमारी से जन जीवन बेहाल था। टीबी के संक्रमण ने अमीर या गरीब सभी का बुरा हाल बना रखा था। इसकी वजह यह थी कि ना तो इसका पुख्ता इलाज था ,और ना हीं जनमानस को इसके संक्रमण से बचाव की समुचित जानकारी थी। हमारे देश के नागरिक बीमारी की जांच के बजाय इलाज करवाते हैं, यह देखने में आया 90% भारतीय अपने स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए नियमित रूप से डॉक्टर से — चेक अप भी नहीं करवाने का ध्यान देते हैंll दरअसल टीबी रोग भी अन्य संक्रमणों की ही तरह एक साधारण से जीवाणु माइक्रोबैक्टेरियम, ट्यूबरक्लोसिस या एसिड फास्ट बेसिलस से होने वाला संक्रमण है। स्मरण रहे रॉबर्ट काक ने 24 मार्च ,1882 को टीबी के जीवाणु की खोज की थी, जो इस बीमारी को समझने में मिल का पत्थर साबित हुई।
टीबी की बीमारी मानव जाति में ट्यूबरक्लोसिस नामक कीटाणु से होती है। इसमें पीड़ित व्यक्ति जब खांसता है या छिकता है तो उसके कीटाणु संपूर्ण वातावरण में फैल जाते हैं। जब दूसरा व्यक्ति इन कीटाणुओं के संपर्क में आता है तो इसके कण जो हवा में रहते हैं ,वह सांस द्वारा उस व्यक्ति के फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। इस रोग की रोकथाम में पहले मरीज को शुरू छह महीने तक हर दिन दवा लेना पड़ती थीl लेकिन अब हफ्ते में एक बार ही इसकी दवा लेना होती है। एंटीबायोटिक दवाइयां का उपयोग बढ़ने से टीबी बैक्टीरिया से प्रतिरोध की ताकत भी बढ़ रही है।
विदित है, कि टीबी एक जानलेवा एवं संक्रामक बीमारी है ,जिसकी रोकथाम बहुत ही जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक रिपोर्ट 2013 के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी एवं एमडीआर टीबी के मरीज भारत में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बताया कि टीबी से होने वाली 95 फ़ीसदी मोते निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में होती है। देश में टीबी के मरीजों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले बहुत ही ज्यादा रहती थी।
वर्ष 2014 के बाद भारत ने नई सोच और दृष्टिकोण के साथ टीबी के खिलाफ काम करना शुरू किया। इसके तहत पांच मोर्चो जनभागीदारी, पोषण के लिए विशेष अभियान, इलाज के लिए नई रणनीति, तकनीक का भरपूर इस्तेमाल और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले खेलो इंडिया और योग जैसे अभियानों पर काम किया। इस तरह टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत साल 2025 तक भारत से टीबी उन्मूलन का आव्हान किया गया है। इस दिशा में भारत सरकार के लगातार प्रयास चल रहे हैं। इससे पिछले कुछ वर्षों से भारत में टीबी के मामलों में काफी कमी आई है। विगत 8 वर्षों में देखे तो इसमें 13 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
आंकड़ों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि वर्ष 2015 में हर साल टीबी के 256 नए मामले रिपोर्ट होते थे जो की वर्ष 2021 में घटकर 210 हो गए। वही टीबी से मुक्ति का वैश्विक लक्ष्य भले ही 2030 तक था, किंतु भारत ने 2025 तक ही टीबी को खत्म करने का संकल्प लिया है। अब प्रश्न यह उठता है, कि भारत सरकार ने वर्ष 2025 तक ही देश से टीबी को खत्म करने का जो लक्ष्य रखा है, क्या वह वास्तव में पूरा हो पाएगा? क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि टीबी खत्म करने के लिए वर्ष 2025 तक का समय बहुत ही कम है। इसका कारण यह है कि वैश्विक आंकड़ों की तुलना में भारत में अभी भी टीबी के नए मामलों की संख्या अधिक है। भारत में मरीजों के करीब 80 प्रतिशत टीबी पल्मोनरी से संबंधित होते हैं, टीबी को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाने के कई कारण है।
अब टीबी मुक्त देश बनाने के लिए में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय इसके उपचार व उन्मूलन पर तेजी से काम कर रहा है। अगर समय पर इसके संक्रमण का पता चल जाए और उपचार में लापरवाही नहीं बरती जाए, तो हड्डी, लिवर, किडनी, आँत, स्पाइन, ब्रेन आदि किसी भी अंग की टीबी हो उसका इलाज पूरी तरह संभव है। पहले इसकी जांच में समय लगता था, लेकिन अब स्वदेशी टूनेट मशीन के आ जाने से थोड़े समय में ही इसके संक्रमण की जानकारी मिल जाती है। सरकार की ओर से इसे नियंत्रित करने के लिए नेशनल ट्यूबरकुलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम जैसी योजनाएं बड़े पैमाने पर चलाई जा रही है। वर्ष 2018 से देश को टीबी मुक्त करने के अभियान की जो शुरुआत हुई है वर्ष 2025 तक इसके संपूर्ण उन्मूलन के लक्ष्य को निश्चित ही पूरा कर लिया जाएगा। इसी लक्ष्य को मध्य नजर रखते हुए जन समुदाय में जागरूकता लाने के उद्देश्य से प्रदेश के सभी स्कूलों में उन्मुखीकरण कार्यशालाएं आयोजित की जा रही है, यह भी स्पष्ट है कि हमारे पास जांच, उपचार की व्यवस्था उपलब्ध है ,लेकिन जब तक अंतिम पंक्ति तक जागरूकता नहीं आएगी, इस भारत के लक्ष्य को प्राप्त करना संभव नहीं हो सकता। अब मरीज के मानसिक सपोर्ट के लिए निक्षय मित्र योजना लागू की गई जिससे कोई भी व्यक्ति, संस्था मरीज को गोद लेकर पौष्टिक आहार का फूड बास्केट देने की लागू की गई।
दूसरी ओर जांच की ऐसी किफायती तकनीक विकसित की गई है जिसमें महत्व ₹35 में रोगी के बलगम से रोग का पता लगाया जा सकता है। इस नवीन तकनीक में एक बार ढाई घंटे में 1500 से ज्यादा नमूनो की जांच की जा सकती हैं, मतलब चंद्र घंटे में रिपोर्ट आ सकती हैं ,और जबकि आमतौर पर टीवी की पुष्टि होने में 42 दिन लग जाते थे। वैसे यह तकनीक महंगी है, पारंपरिक तकनीक से टीबी की पुष्टि करने में डेढ़_दो माह लग जाते थे, यू तो टीबी पर नियंत्रण के लिए 25 जून ,1924 में पहला टीका पेश किया गया था। इसे अब टीबी के खिलाफ सबसे कारगर टीकों में माना जाता है ,अन्य जानकारी में 19 अक्टूबर, 1943 को टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पहली एंटीबायोटिक बनी थी । भारत ही नहीं टीबी दुनिया का घातक संक्रमण बीमारी है, इससे हर साल एक करोड़ से अधिक व्यक्ति संक्रमित होते हैं ,और लगभग 15 लाख लोगों की मौत होती है, टीबी अब गरीब देशों तक सीमित नहीं है, अमीर देश भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने एक संगठन स्टाफ टीबी पार्टनरशिप के डॉक्टर लुसीका डिटियू का कहना है, कि टीबी कोई सीमाएं नहीं मानी जाती है इसलिए सबको सावधान रहने की जरूरत है, वैसे एंटीबायोटिक दवाइयां का उपयोग बढ़ने से टीबी बैक्टीरिया के प्रतिशोधक की ताकत बढ़ रही है ।
डॉ. बी.आर. नलवाया
पूर्व प्राध्यापक ,मंदसौर