शिवरात्रि का पर्व भारतीय संस्कृति में अपनी एक विशेष पहचान रखता है। इस पर्व पर शिव भक्त व्रत रखकर शिव की पूजा एवं आराधना करते हैं, इसलिए इसे शिवरात्रि पर्व का नाम दिया गया। यदि शिवरात्रि को स्वयं परमात्मा द्वारा मनुष्य के सभी दुखों को हरने का स्मृति दिवस कहे, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। शिव की आराधना भारत में अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित है। वैदिक ऋषियों ने केवल रूद्र के रूप में नहीं, शिव के रूप में भी इस राष्ट्र देवता को नमस्कार किया है।
शिव का विवाह हुआ, तो लोगों ने कहा कि किसी बड़े आदमी को बुलाओ देवताओं को बुलाओ, उन्होंने कहा कि नहीं हमारी बारात में तो भूत -प्रेत ही चलेंगे । भगवान शंकर को शिव भी कहा जाता है। उनकी सवारी बैल पर होती है । बैल परिश्रमी होता है, और मेहनत कश बनने की प्रेरणा देता है। शिव को पशुपति की भी कहा गया है, एक बार शिवजी ने अपनी लीला से वृद्ध रूप धारण कर लिया और दिन -विवश की तरह गड्ढे में जाकर ऐसे पड़ गए, जैसे कोई मनुष्य चलता – चलता गड्ढे में गिर पड़ता है। ऐसा करके शिव ने पूण्य और पाप के बारे में विस्तार से बताकर मानव स्वभाव के बारे में जानकारी दी । इसके साथ ही देशवासियों को आध्यात्मिक विकास और मानवीय चेतना को आकार देने का कार्य शिव नहीं किया। शिव सबको अपनाते हैं । ऐसा किसी सहानुभूति, करुणा भावना या भावना के चलते नहीं, वे सहज रूप से ऐसा करते हैं। इसलिए शिव को महादेव, महायोगी, तपस्वी, अघोरी, न र्तक के रूप में सृष्टि की सारी विशेषताओं की जटिल समिश्रण मिलता है तो वह शिव है।
परमात्मा का निजी एवं यथार्थ नाम ‘शिव’ है। शिव का अर्थ है- कल्याणकारी। शिव का एक नाम ‘गंगाधर’ भी है। एक प्राचीन लोक कथा के अनुसार भागीरथ की प्रार्थना के बाद गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये उसके वेग को शिव ने अपनी जटाओं में समाहित किया था। शिव त्रिनेत्र है, उनकी तीसरी दृष्टि प्रलयकारी है। शंकर के तीन नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि है। सूर्य दक्षिण नेत्र है, चंद्रमा वाम नेत्र एवं अग्नि मध्य का तीसरा नेत्र है। इसका अर्थ यह है ,की संपूर्ण ब्रह्मांड ही भगवान शंकर का शरीर है, और उसमें प्रकाश के तीनों केंद्र ही उनके तीनों नेत्र है। तीनो में एक ही प्रकाश है, किंतु वह तीन भिन्न रूपों में दिखाई देता है। उनके हाथों में त्रिशूल एवं डमरू है, जो शस्त्र व शास्त्र के समन्वय का प्रतीक है। त्रिशूल काम, क्रोध, लोभ अथवा दैहिक, दैविक व भौतिक तापों का विनाशक है।
शिव संसार के हित के लिए विषपान करते हैं ,अतः उनसे बड़ा दयालु कौन हो सकता है। उनका कुटुंब भी बड़ा ही विचित्र है। अन्नपूर्णा के घर में रहने पर भी वह भिखारी बने। कार्तिकेय जी सदा युद्ध के लिए तैयार रहते हैं, तो गणेश जी स्वभाव से सदा शांत है। एक गजानन है ,तो दूसरे षडानन एवं भगवान शिव पंचानन है। शिव को शंकर भी कहा जाता है। शंकरजी का आभूषण सर्प, गणेशजी का वाहन मूषक, कार्तिकेयजी का वाहन मयूर एवं पार्वती जी का वाहन सिंह है। यह सभी परस्पर एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं ,लेकिन फिर भी शिव के सानिध्य में यह सभी मिलजुल कर रहते हैं। ऐसी विपरीत पारिवारिक स्थिति में भी जो सहज समाधि लगा लेते हो वह शिव ही हो सकते हैं।
दूसरी ओर देखे तो शिव नरमुंडों की माला से सृष्टि की नश्वरता का दर्शन करते हैं। सिर पर चंद्रमा अमृत का प्रतीक है, तो नरमुंड मृत्यु का। इन दोनों से वे जीवन में समत्व का उपदेश देते है। इस तरह शिव रूहानी ज्ञान, सुख, शांति, प्रेम, पवित्रता एवं शक्ति के सागर है, हमें उनके शाश्वत गुणों के स्वरूप को पहचानना चाहिए। सभी को इस मौलिक आध्यात्मिक सत्य का बोध हो जाए तो समस्त भेदभाव, घृणा, द्वेष, कटुता, शत्रुता और हिंसा आदि असद आचरण समाप्त हो सकते हैं।
शिव सदा ध्यान मुद्रा में लीन दिखाई देते हैं। वास्तुतः सृष्टि के लिए इसीलिए वे आदिदेव है एवं सनातन धर्म के मूलाधार है। सनातन धर्म में एक तत्व जो समस्त भारत को सांस्कृतिक एकता में जोड़ता और बांधता है वह शिव की उपासना है। शिव विभिन्न कलाओं और सिद्धियों के प्रवर्तक भी है। संगीत, नृत्य, योग व व्याख्यान आदि के मूल प्रवर्तक और सभी जीवधारियों के स्वामी है, इस कारण में पशुपतिनाथ और भूतनाथ भी कहलाते हैं। पार्वती द्वारा महादेव शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई तपस्या का फल ही महाशिवरात्रि है। तो क्यो न इस शिवरात्रि पर्व पर शिव के परमात्मा रूप की पूजा आराधना कर हम हमारे जीवन को मंगलकारी बनाये।
डॉ. बी.आर.नलवाया-
पूर्व प्रभारी प्राचार्य , मंदसौर